तलाश...

एक सवेरे की बात है, रात बस छटी ही थी । वो नीला सा सवेरा नहीं होता ? शांत सा, सूरज निकलने से पहले ? बस वैसा ही । इस दृश्य को देखते हुए अदरक वाली कड़क चाय पीते वक्त लगता हैं शायद यही ज़िन्दगी है, फ़िर सूरज निकल आता हैं और जीवन में गर्मी थोड़ी बढ़ जाती हैं ।


तो चाय पीकर और अपने ट्रैक-सूट, जूते आदि से लैस होकर मैं घर से निकला । मामला बस इतना सा था कि मुझे गाड़ी चलानी नहीं आती थी । काफ़ी ताने और कुछ उनसे भी ज़्यादा मीठे शब्दों के उपरांत एक भला मानुष ढूंढा गया जो बाप-बेटे की इस जटिल समस्या का निवारण कर सके । उसने अगली सुबह 7 बजे का समय रखा इस महान विद्या के सबकों के शुभारंभ के लिए । जैसे तैसे हम 4 मिनट का रास्ता आधे घंटे में तय कर पास के मैदान में पहुंचे । वहां पहले से ही किसी और को सीखते देख मेरे मन में कुछ चुनिंदा शब्दों ने दस्तक दी पर मुझे और इस मन को कहां पता था कि अगले कुछ क्षणों में इस लेख का प्रसंग बदलने वाला है । हां आप सही समझे, सामने और कोई नहीं एक हमउम्र भी गाड़ी सीख रही थी । शायद उसका भी पहला या दूसरा दिन ही रहा होगा, क्योंकि जैसे ही मैंने उसकी गाड़ी की तरफ़ देखा उसने बड़ी ज़ोर से ब्रेक मारा, बड़ी तीव्रता से आगे की तरफ़ झुकी और उतनी ही तीव्रता से पीछे भी हो गई । इस व्यायाम के परिणाम स्वरूप उसके बाल बिखर गए । सुबह जल्दी-जल्दी में बांधना भूल गई होगी शायद ठीक से । उसने बड़े सलीके से अपनी पहली उंगली से उन बालों को कान के पीछे किया और कुछ बोलते हुए मुस्कुराने लगी। अगर आपको कोई चेहरा याद आ रहा है तो आज उसको बताना ना भूलें कि वो कितना ख़ूबसूरत है और आप कितने भाग्यवान, और अगर आप उससे कहने की स्तिथि में नहीं हैं तो मन ही मन मुस्कुरा लीजिए जैसे कि मैं मुस्कुरा रहा हूं।


तो कहानी पर वापस आते हैं । मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट आई ही थी कि बगल में बैठे आदिमानव ने पीठ पर कसके थपकी मारी । मेरा सपना सा टूटा तो पता चला न्यूट्रल पर गाड़ी खड़े किए हुए मैं पूरे ज़ोर से एक्सेलेरेटर दबाए हुआ था । शायद ज़्यादा ताकत होती तो पांव गाड़ी में छेद करते हुए नीचे ही चला गया होता । मैंने खिसिया के गाड़ी बंद करदी । बगल वाले ने भी झंझलाते हुए कुछ कहा जो मुझे याद नहीं है पर इस सब से एक बात तो साफ हो गई थी कि, कहानी का हीरो मैं था, हीरोइन वो लड़की और लड़की का बाप यानी कि विलन मेरे बगल में बैठा था। उसके बगल में भी कोई बैठा था पर वो गाड़ी सिखा के ही खुश था।


अभी आधे घंटे के परिश्रम की परीक्षा मुझे उसी समय देनी होगी, यह मैंने नहीं सोचा था । वैसे तो मैं इक्कीस साल का नौजवान था परन्तु कुछ चीज़े आपको आपकी वही नौवीं के बालक वाली हरकतें दोहराने पर मजबूर कर देती हैं। यहां भी वैसा ही कुछ हुआ । इक्कीसवीं सदी का स्वाभिमानी ज्येष्ठ पुत्र, जो एक दिन पहले बाप की गाड़ी होने की वजह से उसको चलाने से इंकार कर रहा था वहीं मूर्ख अब मात्र आधे घंटे पहली सीट पर व्यतीत करके स्वयं को इस कला के किसी विशेषज्ञ से कम नहीं समझ रहा था । इस मंदबुद्धि ने मन ही मन उस लड़की को गाड़ी चलाना सिखाने का दृढ़ निश्चय कर लिया था जिसे अभी नज़र भर के देखा भी नहीं था । तो इरादों में सपने और आंखों में चमक लिए मैंने गाड़ी को स्टार्ट किया और इंतज़ार करने लगा के कब वो शिष्या जिसने शायद अपने इस गुरु को देखा भी ना हो इधर की तरफ़ आए और मैं उसे दिखा सकूं की गाड़ी चलाते कैसे हैं।


मेरे बगल में बैठे महापुरुष को लग रहा था कि उनके पास एक ही दिन है सिखाने को तो मक्खी की तरह भिनभिनाए जा रहे थे । हम भी चाय के पुराने शौकीन थे, बड़ी चतुराई से चाय के कप के ऊपर हांथ फेरते हुए मक्खी भगाए जा रहे थे । इंतज़ार का फल मिला और उसकी गाड़ी इस तरफ़ आने लगी । मैंने भी कस के गाड़ी का स्टीयरिंग व्हील पकड़ा और बाएं हांथ से गाड़ी पहले गियर में डाली । अभी तक देखा हो न देखा हो इस बार तो मुझे उसको बताना ही था कि उसका पता नहीं पर मुझे गाड़ी चलानी बिल्कुल भी नहीं आती हैं । जी हां, मेरे क्लच छोड़ते ही गाड़ी रुक गई और वो सामने से निकल गई । बगल में देखा तो मुंछो में मुस्कुराते चेहरे ने जो कसर रह गई थी वो भी पूरी कर दी । अब इस जिल्लत से उबर पाने को तीन मिनट थे मेरे पास, जिसमे मुझे इस नई समस्या का निवारण करना था । तकरीबन इतना ही समय लगता था उसको घूम के वापिस आने में । मैंने प्रयास शुरू कर दिए । मैंने उधर देखा तो उसकी गाड़ी रुकी हुई थी । ज़रा सोचिए दसवीं की पहली बोर्ड परीक्षा जो गणित की ही होती हैं उसमे एक प्रश्न बचा हो और समय पूर्ण हो चुका हो, पर आपसे आगे बैठा विद्यार्थी निरीक्षक से लड़ रहा हो और उसको तो नहीं पर आपको ज़रूर पांच मिनट ज़्यादा मिल गए हो । बस ऐसा ही कुछ हुआ । मैं अपने इस सौभाग्य पर खुश हुआ और अपने प्रयास करता रहा । आखिरकार मैं सफल हुआ और मेरी गाड़ी चल पड़ी । अब मैं फ़िर से न्यूट्रल पर गाड़ी खड़ी किए इंतज़ार कर रहा था कि कब उसकी गाड़ी आए और में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकूं ।


आशापुर्वक वो गाड़ी फ़िर मेरी तरफ़ आने लगी । इस बार मैं तैयार था । मैंने बड़ी कुशलता से गाड़ी को पहले गियर में डाला और बड़े आहिस्ते से क्लच छोड़ा । मेरी गाड़ी चल पड़ी और बड़े ही रौब से मैंने स्टीयरिंग व्हील घुमाया जिससे की वह मुझे देख सके । पर हाय रे दुर्भाग्य ! इस बार गाड़ी उसके बगल वाला चला रहा था और मेरे इधर मुड़ते ही वो दोनो मेरे पीछे से मैदान के बाहर चले गये । मैंने झल्लाहट के मारे कसके एक्सेलेरेटर को दबाया, गाड़ी का गियर बदला और सामने वाले पेड़ पर भेड़ दी । सारी खिसियाहट गाड़ी के ऊपर निकाल दी । मैंने यह किया ज़रूर पर अपने मन में । क्या करते, गुस्सा अपना था गाड़ी नहीं । उसी दुखी मन से धीरे-धीरे गाड़ी चलाने लगा । वो जो गाड़ी रुकी थी न, उसमे दोनों अपनी जगह बदल रहे होंगे । मुझे लगा तो था कि आज किस्मत इतनी मेहरबान कैसे ? पर मैंने सोचा क्या पता आखिरकार दया आ ही गई हो पर ऐसा कहां होता है जनाब ! हमारे जैसे ही किसी को ऊंट पर बैठे हुए भी कुत्ते ने काट लिया होगा, बस तभी कहावत बन गई । मैं अगले दिन बड़ी उम्मीद से गया पर वो ना उस दिन आई ना फ़िर उसके बाद कभी ।


आज भी जब कभी बिना काम के गाड़ी निकलता हूं तो शायद उसी की तलाश में निकलता हूं । चेहरा तो अब याद नहीं रहा पर उस एहसास की तलाश ज़रूर हैं ।

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