एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा...

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे... मां से कह दूं के बहू मिल गई ! फ़िर उसके फॉलोअर्स की भीड़ देखी और अपनी शक्ल तो थोड़ी अक्ल लगाई और आगे बढ़ गए । जी हां मैं इंस्टाग्राम नामक मंदिर की बात कर रहा हूं । आजकल यह सबसे प्रचलित माध्यम बना हुआ है आराधना का । ईश्वर की नहीं, बल्कि सांसारिक मोह माया की आराधना का । मैं आपको क्या बता रहा हूं, आप ख़ुद ही इंस्टाग्राम के किसी मंदिर के पुजारी होंगे । अपने मंदिर का बड़ा ही तड़कता भड़कता नाम भी रखा होगा । अपने दोस्तों को रोज़ अपने चढ़ावे का प्रसाद भी बांटते होगे । नहीं समझा आया ? अरे, जो आप पोस्ट करते हो ना और अपने फॉलोअर्स से अपेक्षा रखते हो के आपके पोस्ट लाइक करे अर्थात आपके इंस्टाग्राम को चढ़ाए प्रसाद को ग्रहण करे, उसी की बात कर रहा हूं । मैं आपसे कोई अलग नहीं हूं । तो आइए इसी पर कुछ बात करते हैं ।


2009 में जब फ़ेसबुक की सुनामी आयी तो बच्चे क्या बूढ़े क्या हम सभी उसमे बेह गए । चौंकिए मत, मेरे पिताजी मुझसे पहले से फ़ेसबुक का इस्तेमाल करने लग गए थे इसलिए कह रहा हूं । हिन्दुस्तान में पर्सनल स्पेस की कमी का एहसास काफ़ी पहले ही हो गया था मुझे । पिछले दस सालों में एक स्टेटस अपडेट और कुछ प्रोफ़ाइल पिक्चर के अलावा कुछ ज़्यादा कर ही नहीं पाया । पिताजी तो पहले से थे ही धीरे-धीरे और भी रिश्तेदार बिन बुलाए मेहमान की तरह आ गए । जहां बाकी दुनिया स्टेटस और पोस्ट अपडेट से तहलका मचाए हुई थी, मैं फ़ेसबुक अपने नाम का मतलब और अपने से मिलता जुलता फिल्मी सितारा जान कर ही तसल्ली कर लेता था । सभी दोस्तों को कड़ी हिदायत दे रखी थी के गलती से भी टैग ना कर देना । वरना जो एक्स्ट्रा क्लास के बहाने से सैर सपाटे पर निकलते थे वो भी बंद हो जाता । माध्यमिक वर्ग के माता-पिता को लगता हैं के अगर उनका बच्चा पढ़ाई में टॉपर नहीं है तो इसलिए क्योंकि वो कम पढ़ता है । ख़ुद की पहाड़ और नदियों पार करके स्कूल जाने की कहानी और हमारी ज़िन्दगी को इतनी आसान बात देते हैं । मन तो करता है के तुरंत बता दे के ज़माना बदल गया हैं । आपके ज़माने में हाथ-पैर टूटते थे, अब दिल टूटते हैं । कभी लगाई हैं टूटे दिल से गणित ? पता भी हैं 4 को 8 से गुणा करते हैं तो उस 32 रुपए की चॉकलेट का कितना गम होता हैं ? बता दे के अपनी सिगरेट के पैसों से उसके लिए गुलाब खरीदते थे । समय के साथ समस्याएं बदल गई हैं बस । मेहनत आज भी उतनी ही हैं । मन जितना आपका लगता था, उतना ही हमारा भी लगता हैं। थोड़ा उन्नीस बीस मान लीजिए बस । तो इन सब जटिल समस्याओं से जूझते हुए स्कूल तो निकल गया।


फ़िर आया बदलाव । हर मायने में आज़ादी मिली । इस आज़ादी के दो मुख्य क्रांतिकारी थे कॉलेज और इंस्टाग्राम । ना तो कॉलेज में कोई पाबंदी लगाने वाला था ना इंस्टाग्राम में । तो मैंने भी सारी कसर निकालना शुरू करदी । टेढ़ा मुंह कर कर के सेल्फ़ी खींचता और हैशटैग को को कैप्शन बनाकर के अपलोड करता । इतनी कोशिश भी नहीं करी के पढ़ ले कैप्शन और हैशटैग के मायने क्या होते हैं । बस चल दिए भेड़ चाल में मिमियते हुए । करीबन 2 साल तक यूहीं सिलसिला चलता रहा फ़िर एक नायाब घटना घटी मेरे साथ । मेरा दिल टूटा तो याद आया मैं लिखा भी करता था स्कूल में । अब क्योंकि मेरा दिल टूटा था तो मुझे पूरी दुनिया को रुलाना था । और इस अजीब गतिविधि के लिए मैंने शेर लिखने शुरू कर दिए । आप मानोगे नहीं पर कुछ कुछ तो मुझे ही नहीं समझ आते अब । पता नहीं क्या सोच के लिखे थे वह…

पर वह भी एक दौर था,

यह भी एक दौर हैं ।

कल कुछ और था,

आज कुछ और हैं ।।


तो शेरो शायरी करने के बाद कई और चीज़ों में हाथ मारा पर सफ़लता को हम कुछ ख़ास पसंद है नहीं । उसने भी फ्रेंडजोन करके रखा हुआ है शायद। हम मेहनत तो करते हैं पर वह सिर्फ “hmm” और “k” में जवाब देती हैं, कभी कभी तो वह भी नहीं । चलिए कभी न कभी मानेगी ही और सफलता पर ज़्यादा ध्यान दूंगा तो रास्ते की अड़चने बुरा मान जाएंगी । तो अब नई धुन थी के किसी तरह इंस्टाग्राम के चर्चित हस्ती बन जाए । सबसे बड़ी गलती। वो भी जब तब शक्ल और नोट दोनों सडे़ हुए हो आपके पास । जिनके पास कुछ नहीं होती उनके पास भूख होती हैं । हमे भी भूख ही थी । तरह तरह से हाथ पैर मारे के ऐसे नहीं तो वैसे पर फॉलोअर्स और लाइक्स बढ़ जाए । दोनों हैं तो एक ही मां की संताने पर ज़रूरत का पेट भर सकते हैं लालच का नहीं । हम जो चाहते थे हमको मिल तो गया पर मिलते ही कम लगने लगा । कुछ और महीने इन्हीं उधेड़बुन में लगे रहे फ़िर एक दिन अभिमन्यु की कहानी पढ़ते वक़्त अपने चक्रवयूह का एहसास हुआ । घुस तो गए थे पर निकल नहीं पा रहे थे ।

अब यह एक नई समस्या थी । जीवन भर तो मज़ाक बनाते आए थे उन लोगों का जो छोड़ देते थे सोशल मीडिया या फिर सफेद डीपी लगा लेते थे अवसाद में । अब वही खुद कैसे करते ? स्वैग ख़तम हो जाता सारा । लेकिन फ़िर काफ़ी सोचने के बाद एक दिन यह कदम भी उठा ही लिया । आप मानेंगे नहीं पर ज़िन्दगी सोशल मीडिया के बाहर भी खूसूरत हैं । मतलब बस वग़ैरा में सफ़र करते वक़्त तो लगता था कि सिर्फ़ मेरी गर्दन ही सीधी हैं बाकी सब झुकी गर्दन वाले हैं । लोग खिड़की वाली सीट पर बैठ कर भी फोन को देखते हैं । इतना बुरा हाल हैं बताइए । कुछ किताबें थी जो खरीदी बड़े शौक से थी लेकिन फ़ुरसत में उनके लिए वक़्त निकालना पहाड़ हो गया था । जो किताब जितनी मोटी थी उतनी जल्दी ख़त्म हो गई । निजी ज़िंदगी में भी काफ़ी फ़र्क पड़ा । अपनी ज़िन्दगी थोड़ी कम गमगीन लगने लगी। दूसरों की छुट्टियों और ख़रीद-फरोद को कोसने से छुटकारा मिला । काफ़ी कुछ याद आ गया 2009 से पहले रहते कैसे थे और तब ज़्यादा ख़ुश क्यों थे । कई दिन बाद कुछ कारणवश वापस आना पड़ा पर इस वैकेशन ने काफ़ी फर्क ला दिया था । अब इंस्टाग्राम के लिए वक़्त निकालना पड़ता था इंस्टाग्राम से नहीं । आप भी कुछ दिन का विश्राम दीजिए इस दैविक अस्त्र को, आपको भी फर्क लगेगा । लाइफ वुड भी फ्री ऑफ नेगेटिविटी...

2 views0 comments

Recent Posts

See All