उसे जो मैंने देखा...

जब कभी हम उपर्युक्त वाक्य सुनते या पढ़ते हैं तो हम मन ही मन वो गाना भी गुनगुनाने लगते हैं और किसी के उस ख़ूबसूरत एहसास में खो जाते हैं । ऐसा ही हैं ना ? पर मैं आपको बता दूं के ये वाक्या ऐसी किसी भी चीज से कोसों दूर हैं । शीर्षक उपयुक्त हैं परन्तु जिस भावना से आप सोच रहे हैं वो भावना गालत हैं आइए जानते हैं।


आज सुबह जब सड़क पार कर रहा था तो आधे रास्ते पर आकर बाईं ओर देखा तो एक स्कूटी आ रही थी । आमतौर पर ऐसे स्तिथियों में हम जल्दी से आधा रास्ता भी पार कर लेते हैं क्योंकि ज़िन्दगी तो सबके पास होती है गवाने के लिए पर समय नहीं होता । तो मैंने भी यही सोचा और अपना कदम आगे बढ़ाने का सोच ही रहा था के रुक गया । क्यों ? क्योंकि मैंने उस लड़की को देख लिया । अब आप सोच रहे होंगे के हिंदी सिनेमा की तरह समय रुक सा गया और सितार-वीणा बजने लगे और पुष्पवर्शा होने लगी । नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ । जब मैंने उसकी तरफ़ देखा तो वो काफ़ी घबराई हुई सी थी । पूरा ऊपर से नीचे तक अंग रशक सामग्रियों से लैस और काफ़ी सधी हुई रफ्तार में स्कूटी चला रही थी । यह देखकर मैं वहीं रुक गया और उसके जाने के बाद ही रास्ता पार किया । अब हो सकता है कि किसी और वजह से वो परेशान हो परन्तु उसके स्कूटी चलाने के अंदाज़ से मुझे यह कारण नहीं लगा । सड़क पर उतरे कई साल हो चुके हैं और भाग्य कहिए या दुर्भाग्य पर करीबन हर प्रकार की स्तिथि में स्कूटर इत्यादि चला चुके हैं । वह 5 मिनट का रास्ता 2 मिनट में भी पार किया हैं और 10 मिनट में भी । तो सड़क और ज़िन्दगी के अनुभवों से यह पता है कि आपकी रफ़्तार काफ़ी कुछ बता देती हैं आपकी मंज़िल के बारे में ।


उसकी रफ़्तार धीमी थी, ख़ाली सड़क पर हॉर्न बजा रही थी, हेलमेट एवम् दस्तानों से लैस थी और ब्रेक का भी परिपूर्ण उपयोग कर रही थी और फ़िर भी माथे पर शिकन थी । कोई उसकी उम्र का लड़का होता तो शायद इस सड़क पर एक पहिए पर या हाथ छोड़ के चाला रहा होता । हां ऐसा करते हैं हम, कोई वजह नहीं है बस करते हैं । हालात यहां तक बुरे हैं के मां लिखा हुआ स्टीकर लगाना पड़ता है ताकि भूल ना जाए के एक घर भी हैं जिसमें रहते हैं, गालियां पड़ती है पर बाहर जाओ तो लोग लौटने का इंतजार भी करते हैं । नालायक ही सही धनिया पुदीना तो ला ही देते हैं । तो उस लड़की पर आते हैं, इस सब को देखते हुए मैं इस नतीजे पर पहुंचा के वो शायद परेशान इसीलिए थी कि वो लड़की थी । यह बात उसी समय मेरे दिमाग में आई और मैं सोचने लगा ।

आजकल बेरोजगारी से इश्क़ कर बैठे हैं तो खर्चों से तलाक ले लिया हैं । इसीलिए आस पास के कामों के लिए चलना ज़्यादा पसंद करते हैं । हर हफ़्ते दो सौ रुपए पेट्रोल के लिए स्वाभिमान मांगने नहीं देता । कभी जो बड़ी उममीदों से मोटरसाइकिल खरीदी थी आज बस चलती रहे यह देखने को निकलती हैं । तो इसी सब के चलते नए विचारों ने भी आगमन कर लिया हैं । हम कितनी आसानी से महिलाओं को गाड़ी ना चला पाने का दोषी करार देते हैं । तरह-तरह के व्यंग कसते हैं । मोहल्ले में किसी ने नई नई सीखी होती है तो उसका मज़ाक उदा देते हैं एक छोटी सी गलती पर भी । हम तो साइकिल से शुरुआत करके कभी रुकते ही नहीं । दसवीं पास करके मोटरसाइकिल मिल जाती हैं और फ़िर घर में गाड़ी हैं तो बस चाबी चुराने की देर होती हैं पिताजी की नजर बचा के । आमतौर पर लड़कियां इस तरह से नहीं चलती हैं । मोटसाइकिल की जगह उन्हें स्कूटी का शौक होता है जो एक्सेलेरेटर घुमाने से ज़्यादा और कुछ नहीं सिखाती । ब्रेक भी आमतौर पर लड़कियां पैरों से ही लगाती हैं तो ब्रेक का भी ज्ञान काम ही होता होगा । समस्या तब शुरू होती है जब हमारी बराबरी पर आती हैं महिलाएं । शायद हमसे ये बर्दाश्त नहीं होता या जो भी कारण हो, हमको ये पचता नहीं । हालांकि यह बिल्कुल भी निराधार नहीं हैं । कुछ अजूबे मैंने भी देखे हैं पर अगर तुलना की जाए तो उन अजूबों में पुरुष ही ज़्यादा नजर आएंगे । तो यह कोई इतनी बड़ी समस्या भी नहीं हैं । गाड़ी चलाना कोई लिंग आधारित कार्य थोड़े हैं । आपको बड़ी बढ़िया गाड़ी चलाने आती हैं तो गाड़ियों की रेस में हिस्सा वग़ैरह लीजिए, काहे को अपने हुनर कि बर्बादी करते हैं । रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में काम चलाने लायक भी जिसको आती हैं और वो सड़क के नियमानुसार चलता है तो उतना ही काफी हैं । भारत में मर्सिडीज और बीएमडब्लू तो लोगों के पास आ गई हैं, लेकिन सड़क पर चलने की अक्ल में थोड़ी कमी हैं अभी भी । सूत्रों के अनुसार, 2016 में डेढ़ लाख लोगों ने इस तरह गाड़ी/मोटरसाइकिल चलाई के सीधा स्वर्ग सिधार गए । हमेशा की तरह यहां भी पुरुषों की संख्या ही ज़्यादा हैं । महिलाएं जैसी भी चलाती हैं, घर तो पहुंच ही जाती हैं ।


जिस देश में आज भी बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा सरकार के मैनीफेस्टो में हो वहा पर अगर महिलाएं घर से निकल कर अपनी जिम्मदारियां खुद उठा रहीं हैं तो हमें भी उन्हें सरहना चाहिए । और कुछ ना सही, बिना झंझलाए हुए रास्ता तो दे ही सकते हैं ।

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